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महात्मा गांधी का हिन्दी प्रेम 

 

हिंदी के विकास में गांधीजी का योगदान :
राष्ट्र भाषा हिंदी :

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हिन्दुस्तान में व्यावहार के लिए हिंदी भाषा एक एसी भाषा हे जिसकी हमे जरूरत है ऎसा महात्मा गांधी ने कहा था, आज ज्यादा से ज्यादा लोग हिन्दी जानते हैं, और बाकी लोग सभी हिन्दी सीख लेंगे, एसी भाषा निश्चित रूप से हिंदी ही हे, उत्तर के हिन्दू और मुस्लिम समुदाय दौनों यह भाषा बोलते हैं, और समजते भी है, वहीं बोली उर्दू लिपि में लिखा जाता है तब वो उसी नाम से जाना जाता है, 1925 की साल में कानपुर में आयोजित बैठक में मान्य हुए अपने महत्वपूर्ण नियम मे पूरे हिन्दुस्तान की वहीं बोली को राष्ट्रीय महा सभा ने हिन्दुस्तानी के नाम से पहचाना गया है तब से ओर कुछ नहीं लेकिन सिद्धांत के रूप में हिन्दुस्तानी राष्ट्र भाषा मानी गई है, सिद्धांत मे गांधीजी ने जान बूझकर ऎसा कहा था कि खुद राष्ट्रीय महा सभा वादियों ने भी उसका जितना रखना चाहिए उतना ख्याल रखा नहीं है, हिंदुस्तान की आम जनता की राजकीय समज के लिए हिंद की बोलियों का महत्व पहचानने की और उसे स्वीकार कर ने की एक महत्व पूर्ण कोशिश 1920 की साल में शुरू की गई थी, इस लिए राजकीय रूप से जागरूक हुआ हिंद सरलता से बोल सके, और हिंद के अलग अलग प्रांतों में से महा सभा के अखिल हिंद आयोजनों में इकट्ठे होते महा सभा वादियों समज सके एसी समग्रतः हिन्दुस्तान की एक बोली को पहचानने का और स्वीकार करने का खास प्रयास किया गया था, यह राष्ट्र भाषा की हम सभी लोग उसकी दौनों शैली ओ को समझकर तथा बोल सके और उसे दौनों लिपि में लिख सके इस तरह सीखना चाहिए
  गांधीजी बताते हैं कि मुजे बड़े दुख के साथ कहना पड़ता है कि, बहुत सारे महा सभा वादियों ने नियम का पालन नहीं किया है, और उस के कारण मेरी समज हे कि, कलंक रूप अंग्रेजी बोल ने का आग्रह रखने वालों को खुद को समज मे आ जाए उसके खातिर ओर लोगों को भी वहीं भाषा में बोलने की फर्ज थोपने वाले महा सभा वादियों का बेहूदा दिखावा अब तक हमे देखना पड़ता है, अंग्रेजी बोली ने जो जादू चलाया हे उसकी असर मे से अब तक हम छूट नहीं सके हे, वो जादू की असर से हम हिन्दुस्तानी अपने ध्येय मे आगे बढ़ने की कूच को रोक रहे हैं, अंग्रेजी पढ़ने के लिए हम जितने साल बिगाड़ते हे इतने महीने भी हम हिन्दुस्तानी हिंदी सीखने की तकलीफ न उठाए तो सच में ही आम जनता पर के प्रेम की जो बाते किया करते हैं वो प्रेम सिर्फ दिखावे के सिवा और कुछ नहीं है,!
दस वा विश्व हिंदी सम्मेलन 10 - 12 सितंबर को भोपाल भारत में आयोजित किया गया था, भाषा शास्त्रीय ओ का मानना है कि 21 वी सदी के अंत तक विश्व की 6000 मे से 90 %भाषा ए लुप्त हो सकता है, माननीय प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने उसका उद्घाटन किया गया था, गुवाहाटी में 28 सितंबर 2011 को पाण्डु महा विद्यालय में समाज सुधारक कबीरदास विषय पर एक संगोष्ठी आयोजित किया गया था, उस समय महात्मा गांधी  अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्व विद्यालय मे पुस्तक प्रदर्शनी लगाई गई थी, इस तरह आज हिंदी विश्व भाषा की ओर प्रयाण कर रही है,
हिंदी आज अंग्रेजी की तुलना में पांच गुना तेजी से बढ़ रही है, हिंदुस्तान में हर पांचवां प्रयोगकर्ता हिंदी का उपयोग करता हे, अंग्रेजी की सामाग्री की खपत केवल 19 फीसदी दर से बढ़ रही है जब कि देश में हिंदी सामग्री की डिजिटल मीडिया में खपत 94 फीसदी के दर से बढ़ रही है,
आज से 60 साल पहले 14 सितंबर 1949 को देव नागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिन्दी भाषा को भारत की राज भाषा के रूप में स्वीकार किया गया है,
गांधीजी बताते हैं कि, हमारी अपनी मातृभाषा के बजाय अंग्रेजी भाषा पर ज्यादा प्रेम रखा है, इस लिए शिक्षित तथा राजकीय उच्च वर्ग के लोगों से आम समुदाय अलग हो गया है, और वो दौनों के बीच गहरी खाई बन गया है, और उसी कारण भाषा ये गरीब बन गई है, उन्हें जरूरी पूरा पोषण मिला नहीं है, उल्टे पुल्टे गहरे तात्विक विचारो से हमारी मातृभाषा में फोकट मेहनत करते वक़्त हम उलझन में पड़ जाते हैं, हमारे पास विज्ञान की कोई परिभाषा नियमित रूप से नहीं हे, ये सभी का परिणाम भयानक आया है, हमारी आम जनता आधुनिक मानस से याने कि नए ज़माने के विचारो से दूर रहा है, हिंदुस्तान की महान भाषा ओ को जो नजर अंदाज किया है उसके परिणाम स्वरुप हिंद को बहुत नुकसान पहुंचा है, उसका अंदाजा हम आज निकाल नहीं सकते हैं, क्यू की हम सभी उस घटना के करीब है, लेकिन इतना तो समझना जरूरी है कि, आज तक पहुचे हुए नुकसान का कोई इलाज नहीं है, याने कि जो खोट आई है उसे पूरा करने के लिए यदि हम मेहनत नहीं करेंगे तो हमारी आम जनता का मानस स्वराज के लिए अपना योगदान ठीक से नहीं दे सकेंगे, अहिंसा के सिद्धांत पर रचे गए स्वराज प्राप्ति की बात मे ये बात शामिल हैं, हमारे सभी आदमी हमारी स्वतन्त्रता की लड़ाई में अपना स्वतंत्र योगदान दे, लेकिन हमारी आम जनता लड़ाई के सभी कदम जाने नहीं और समझे नहीं तब तक स्वराज की लड़ाई में अपना योगदान केसे देगा? और आम जनता की खुद की बोली में लड़ाई के हर कदम की अच्छी तरह जानकारी नहीं दी जाएगी तो ये बन सके एसी उमीद केसे रख सकते हैं? 

गांधीजी का हिन्दी प्रेम 

1918 मे गांधीजी ने हिंदी साहित्य सम्मेलन में हिंदी भाषा को राष्ट्र भाषा बनाने के लिए कहा था, हिंदी भाषा को जनहित की भाषा गांधीजी ने बताया था,
1949 मे स्वतंत्र भारत के प्रश्न पर 14 सितंबर मे हिंदी भाषा को राष्ट्र भाषा बनाने का विचार विमर्श बाद यह निर्णय लिया गया जो भारतीय संविधान के भाग 17 के अध्याय की धारा 343(9) मे इस प्रकार हैं,
"संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी, संघ व राजकीय प्रयत्नों के लिए प्रयोग होने वाले अंक का रूप अंतरराष्ट्रीय रूप होगा,
  यह निर्णय 14 सितंबर को लिया गया इस कारण हिंदी दिवस के लिए इस दिन को श्रेष्ठ माना गया है, गैर हिंदी भाषी राज्य के लोग इसका विरोध करने लगे तो और अंग्रेजी की भी राजभाषा का दर्जा देना पड़ा, इस कारण हिंदी में भी अंग्रेजी भाषा का प्रभाव पड़ने लगा,
हिंदी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिए राष्ट्र भाषा प्रचार समिति वर्धा के अनुरोध पर वर्षा 1953 से भारत में 14 सितंबर को प्रतिवर्ष हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है,
हिंदी को भारत में राजभाषा के रूप में 14 सितंबर सन 1949 को स्वीकार किया गया, इस के बाद संविधान में अनुच्छेद 343 से 351 तक राजभाषा के संबंध में स्वी कार की गई, इसकी स्मृति को ताजा रखने के लिए 14 सितंबर के दिन प्रतिवर्ष हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है,
भारतीय संविधान में राष्ट्र भाषा का उल्लेख नहीं है, संसद का कार्य हिंदी में या अंग्रेजी में किया जा सकता है, लेकिन राज्यसभा के सभा पति महोदय या लोकसभा के अध्यक्ष महोदय विशेष परिस्थिति मे रुके गए सदस्य को अपनी मातृभाषा में सदन को संबोधित करने की अनुमती दे सकते हैं, (संविधान का अनुच्छेद 120)
  स्वतंत्रता पूर्व 1833-86 गुजराती के महान कवि श्री नर्मद(1833-86)मे हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाने के लिए विचार रखा था,
 1872 आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द सरस्वती जी कोलकाता में केशव चंद सेन से मिले तो उन्होंने स्वामी जी को यह सलाह डाल दिया कि आप संस्कृत को छोड़कर हिंदी बोलना आरंभ कर दे, तो भारत का कल्याण हो सकता है, तभी से स्वामी जी के व्याख्यान की भाषा हिंदी हो गई और इसी कारण स्वामी जी ने सत्यार्थी प्रकाश की भाषा हिंदी ही रखी, सत्यार्थी प्रकाश आर्य समाज का आधार ग्रंथ है,. 1918 मे मराठी भाषी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने कौंग्रेस अध्यक्ष की हैसियत से घोषित किया कि हिन्दी भारत की राजभाषा होगी,
1918 इंदौर में संपन्न आठवे हिंदी सम्मेलन अध्यक्षता करते हुए महात्मा गांधी ने कहा कि, मेरा यह मत है कि हिन्दी को हिन्दुस्तान की राष्ट्र भाषा बनते गौरव प्रदान हो, हिंदी सभी समझते हैं, इसे राजभाषा बनाकर हमे अपना कर्तव्य पालन करना चाहिए, 1918 महात्मा गांधी द्वारा दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की स्थापना की,
1886 मे इंदिरा गांधी ने राजभाषा पुरस्कार प्रारम्भ किया गया, 1988 को सयुंक्त राज जनरल एसेम्बली के तत्कालीन विदेश मंत्री श्री नरसिंह राव ने हिंदी में बोला था, 14/09/1999 संघ की राजभाषा हिन्दी की सुवर्ण जयंती मनाई गई, मई 2018 अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् ने हिंदी माध्यम से इंजीनियरिंग की शिक्षा को अनुमती दी गई '17 जुलाई 2019 सर्वोच्च न्यायालय ने अपने सभी निर्णय हिंदी और अन्य असमिया, कन्नड, मराठी, ओडिया, तेलुगु में भी अनुवाद किया गया!
राष्ट्र भाषा प्रचार आंदोलन :गांधीजी का योगदान :
विश्व की शायद ही किसी भाषा का प्रचार इतनी शीघ्रता और इतने बड़े पैमाने पर हुआ हो, जितना कि (राष्ट्र भाषा के रूप में) हिंदी का, यह भी सच है कि शायद ही किसी भाषा के स्वरुप को लेकर इतना मतभेद रहा हो जितना कि इस भाषा के सम्बंध में रहा है, हिंदी को राष्ट्र भाषा का पद प्राप्त करने के लिए अनेक संघर्ष का सामना करना पड़ा है, राष्ट्र भाषा हिंदी के प्रचार का इतिहास भारत के स्वातंत्र्य संग्राम के इतिहास के समांतर अग्रसर हुआ है, और वह उसी के समान महत्व पूर्ण भी है, जिस प्रकार बापू के व्यक्तित्व को समझे बिना हमारी स्वतन्त्रता का इतिहास समझ में नहीं आ सकता है, उसी प्रकार बापू के योगदान को समझे बिना हिंदी प्रचार आंदोलन का वास्तविक स्वरूप समझ में नहीं आ सकता है, पंडित जवाहरलाल नेहरू ने बापू की इस विशेषता के सम्बंध में एक जगह कितना अच्छा लिखा है, 
एक बड़ी भारी मूर्ति की तरह बापू हिन्दुस्तान के इतिहास की आधी सदी में पांव फैलाकर खड़े हे, वह बड़ी भारी मूर्ति शरीर की नहीं, बल्कि मन और आत्मा की हे, 
भाषा समस्या के अधिकारी विद्वान स्व. श्री मगन भाई देसाई ने अपनी 'हिंदी प्रचार मूवमेंट' शीर्षक अंग्रेजी पुस्तक में, हिंदी प्रचार आंदोलन मे बापू के योगदान के सम्बंध में स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि, 
'भारत में हिंदी प्रचार आंदोलन का इतिहास मुख्यतौर पर महात्मा जी के इस दिशा में किए गए प्रयत्नों का इतिहास हे, 
(हिंदी प्रचार मूवमेंट, पृ. 2) 
स्वर्गीय मगन भाई देसाई का कथन अक्षर सह सत्य है सन 1908 से सन 1948 तक के राष्ट्र भाषा प्रचार के प्रायः सभी प्रयत्न गांधीजी के नेतृत्व में अर्थात्‌ उनको केंद्र में रखकर हुए थे, 1908 से पूर्व भी हिंदी प्रचार के छिटपुट प्रयत्न सहज रूप में हुए थे, इस तथ्य को भी आ स्वीकार नहीं किया जा सकता है, 
इनके पश्च्यात स्वामी दयानन्द सरस्वती और उनके आर्य समाज ने भी हिंदी के विकास में महत्व पूर्ण योगदान दिया है, 
सन 1909 मे महात्मा गांधी जी ने 'हिंद स्वराज' मे अंग्रेजी भाषा का विरोध और हिंदी का समर्थन करते हुए स्पष्ट रूप से लिखा था, "हरेक पढ़े लिखे भारतीय को स्व भाषा का, हिन्दू को संस्कृत का, मुस्लमान को अरबी भाषा का, पारसी को पर्शियन का और सब को हिंदी का ज्ञान होना चाहिए," 
महात्मा जी के इस उद्घोष को राष्ट्र भाषा प्रचार आंदोलन का प्रथम शंखनाद समझना चाहिए, इस के द्वारा हिंदी प्रचार का जो सक्रिय आंदोलन प्रारम्भ हुआ उसकी परि समाप्ति ठीक 40 वर्ष बाद 14 सितंबर 1949 को हुई, इस दिन भारतीय संविधान ने हिंदी को राज भाषा के रूप में स्वीकार किया, महात्मा गांधी ने सन 1909 से राष्ट्र भाषा के बारे में गम्भीरतापूर्वक सोचना - विचारणा चालू कर दिया था, किन्तु प्रचार आंदोलन का सक्रिय प्रारम्भ हिंदी साहित्य सम्मेलन के सन 1918 के अधिवेशन से मानना अधिक उचित प्रतीत होता है, सन 1935 मे सम्मेलन का अधिवेशन इंदौर में हुआ, जिस के गांधीजी फिर सभापति बने, सन 1949 मे भारतीय संविधान ने हिंदी को राज भाषा के रूप में मान्य किया, आज गांधी शताब्दी के 150 वर्ष के इस पावन पर्व पर हिन्दी आंदोलन सूत्र पात के सो वर्ष पूरे हो रहे हैं, अध्ययन की सुविधा के लिए हिंदी प्रचार आंदोलन के इस डेढ़ सो वर्ष के इतिहास को उपर्युक्त सूत्रों के आधार पर तीन स्पष्ट काल खंड में विभाजित कर सकते हैं,
1.प्रारम्भिक काल :सन 1918 से 1935 तक 
2. संघर्ष काल : सन 1935 से 1946 तक 
3.स्वातंत्र्य काल : सन 1946 से आज तक 
भाषा के बारे में गांधीजी बड़े दूरदर्शी थे, उनकी मान्यता थी कि साहित्य केवल पढ़े लिखे वर्ग तक सीमित न रहे, उसकी सुवास ग्रामीण जनता तक भी पहुंचनी चाहिए, इसके अतिरिक्त सभी प्रांतीय साहित्य का आपस में आदान प्रदान भी वे आवश्यक समझते थे, गांधीजी के साहित्य सबंधी विचारो ने न केवल गुजराती ब्लकि सभी भारतीय भाषाओं और उनके साहित्य को प्रभावित किया था, वे युग पुरुष थे, भारतीय साहित्य को उन्हों ने एक सुनिश्चित दिशा दी है, 
राष्ट्र भाषा के लक्षण :
सन 1917 मे भ रू च की 'गुजरात शिक्षा परिषद्' के दूसरे अधिवेशन में दिए गए भाषण में उन्होंने राष्ट्र भाषा के पांच प्रमुख लक्षण का निरूपण किया गया था, ये लक्षण उन्हीं के शब्दों में इस प्रकार हैं,. 
1.अधिकारी ओ के लिए वह भाषा सरल होनी चाहिए. 
2. उस भाषा के द्वारा भारत वर्ष का आपसी धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यावहार हो सकना चाहिए. 
3. यह जरूरी है कि भारत वर्ष के बहुत से लोग उस भाषा को बोलते हैं, 
4.राष्ट्र के लिए वह भाषा आसान होनी चाहिए 
5.उस भाषा का विचार करते समय किसी क्षणिक या अल्प स्थायी स्थिति पर जोर नहीं देना चाहिए, 
राष्ट्र भाषा की परिभाषा :
महात्मा गांधी ने जिस हिंदी को राष्ट्र भाषा के रूप में स्वीकार किया उस की परिभाषा तथा व्याख्या भी उन्होंने अपने लेखों तथा भाषणों में प्रस्तुत किया, हिंदी साहित्य सम्मेलन के इंदौर अधिवेशन (सन 1918) मे उन्होने अपनी इस परिभाषा को आग्रह के साथ अध्यक्षीय भाषण में प्रस्तुत किया. 
'हिंदी भाषा वह भाषा हे, जिसको उत्तर में हिंदू व मुस्लमान बोलते हैं, और जो नागरि अथ वा फारसी लिपि में लिखी जाती है, यह हिंदी एकदम संस्कृत मई नहीं है, न वह एकदम फारसी शब्दों से लादी हुई है, "
उल्लेखनीय यह बात हे कि, हिंदी की परिभाषा केवल अध्यक्षीय भाषण का अंश न होकर उस प्रस्ताव का भी अंश है, जिसे सम्मेलन ने स्वीकार करके अपने उद्देश्यों मे भी सम्मलित कर लिया था, 
गांधीजी द्वारा प्रस्तुत की गयी हिंदी की यह परिभाषा उनकी भाषा नीति की बुनियाद है, इस मे तीन बाते डस्ट व्य है, 
1. हिंदी उत्तर भारत के हिन्दू मुसलामानों की संयुक्त भाषा हे 
2.वह नागरी तथा फारसी दौनों लिपियों में लिखी जाती है 
3. उनका वास्तविक रूप न संस्कृतनिष्ठ है न फारसी युक्त 
राष्ट्र भाषा के विकास के इतिहास में सम्मेलन से महात्मा गांधी जी के सम्बंध विच्छेद को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है, विशेषकर इस लिए कि यह घटना राष्ट्र भाषा की परिभाषा को लेकर घटीं थी, 
महात्मा गांधी ने एक राष्ट्र और एक राष्ट्र भाषा का स्वप्न देखा था, इस स्वप्न को साकार करने के लिए वे हिंदू मुस्लिम ऐक्य एवं हिंदी उर्दू के समन्वय की आजीवन हिमायत करते रहे, यदि यह कहे कि इन्हीं के लिए वे बलिदान हो गए, तो भी अत्युक्ति न होगी, क्यो की इन्हीं बातों को लेकर प्रतिक्रियावादी तथा क्रांतिकारी लोग उनसे विशेष रूप से असंतुष्ट थे, 
सच्चा शिक्षण स्व भाषा के माध्यम से ही होना चाहिए यह उनकी मान्यता थी, इस लिए अपनी परिकल्पना की राष्ट्रीय विश्व विद्यालय 'गुजरात विद्यापीठ' मे जब उन्होंने सन 1920 मे हिंदी हिन्दुस्तानी के शिक्षण को अनिवार्य विषय बनाया, तो शिक्षा के माध्यम के रूप में स्व भाषा (गुजराती) को चुना, विद्यापीठ के विधान मे ईन दौनों तथ्यों का स्पष्ट निर्देश दिया है,
राष्ट्र भाषा हिंदी हिन्दुस्तानी का शिक्षण विद्यापीठ के अभ्यास क्रम में अनिवार्य रहेगा, सन 1919 से गांधी युग का प्रारम्भ हुआ ऎसा मानना चाहिए, हिंदी साहित्य के इतिहास में इस युग को छायावाद युग कहा गया है! उन्होंने दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा तथा अहमदाबाद में नवजीवन और गुजरात विद्यापीठ जेसी राष्ट्रीय संस्था ओ की स्थापना की है!. 
महात्मा गांधी जी की एक सो पचास वी जन्म जयंती के अवसर पर उन्हें श्रधा से नमन करते हैं! 
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डॉ गुलाब चंद पटेल. 
कवि लेखक अनुवादक.
अध्यक्ष महात्मा गांधी साहित्य मंच गांधीनगर Mo 8849794377



Posted By:ADMIN






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