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मूषकराज पर आगमन

"अरे.. गणेश बेटा! कितनी सारी उथल-पुथल करके रखा हैं, सारा सामान यहाँ-वहाँ बिखरा पड़ा हैं।" माता पार्वती ने बाल गणेश पर झुंझलाते हुए कहा।
“ले लिया सारा सामान, वापस एक बार अपना झोला देख लो और हाँ! तुम्हें वहाँ सिर्फ़ ११ दिन रहना हैं कोई भी ज़्यादा रुकने के लिए कहे तो मना कर देना। अभी कोरोना काल चल रहा हैं ज़्यादा दिन रुकना ठीक नहीं होगा, समझे?" देवी पार्वती ने गणेश जी को हिदायत देते हुए कहा।
"माँ, तुम कितनी परेशान होती हो" गणेश जी ने माता पार्वती की तरफ़ देखकर कहा।
"देखो, पृथ्वीवासियो को बाँटने के लिए मैने सबकुछ ले लिया हैं, यह रहा आशीर्वाद, वर, संतोष, शांति, सफलता, सुख, समृद्धि सबकुछ।"
“अच्छा! तो बताओ ज्ञान कहाँ हैं?” माता पार्वती ने स्मित हास्य करते हुए गणेश जी से पूछा।
गणेश जी अपने झोले में ज्ञान को टटोलते रह गये और निराश होकर अपनी माता को देखने लगे।
माता पार्वती ने गणेश के कंधे पर अपना हाथ रखते हुए कहा, "अरे बेटा! इस कोरोना काल में पृथ्वीवासियों के लिए ज्ञान कि बहुत ज़रूरत हैं। जब तुम अच्छा और सुरक्षित ज्ञान बाँटोंगे तभी तो वह इस महामारी से दूर रहकर अपने परिवार और समाज की रक्षा कर सकते हैं।"
"हाँ ...माँ! आप बिलकुल ठीक कह रही हैं। अब चलो मुझे शिक्षा की पोथी दे दो जिससे मैं जल्दी जा कर उन्हें ज्ञान बाँट सकू।" गणेश जी ने अपनी माँ से विनतीपूर्वक कहा।
शिक्षा की पोथी देने के पश्चात माता पार्वती ने बालक गणेशजी के चेहरे पर अपना हाथ घुमाया और बलाएँ लेने लगी। बलाएँ लेते-लेते उनकी आँखें नम हो गयी पर किसी तरह अपने मोह और प्रेम को दूर करते हुए उन्होने दोनों हाथों से गणेश जी को अपनी तरफ़ करते हुए कहा।
“बेटा.. गणेश!  आजकल पृथ्वीवासी-मानव बहुत ही अजीब हो गया हैं उसके व्यवहार में बहुत सारे बदलाव आने लगे हैं। वहाँ पर मानवता तथा संवेदनशीलता लुप्त होती जा रही हैं। किसी में भी संयम तो ज़रा भी नहीं रहा। हर जगह भीड़ लगाकर एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश में लगे हैं।" माता पार्वती ने चिंताजनक दृष्टि से कहा।
“हाँ... माँ! मैने भी यह सभी चीजों का अभ्यास कर लिया हैं। मैने भी देखा हैं कि कैसे मानव इस महामारी में भी एक दूसरे को धोखा देकर धन कमाने के पीछे लगा हुआ हैं। जिनके पास ख़ूब सारी धन-सम्पति हैं वह भी कभी-कभी और धन की लालच में मानवता की परवाह किए बिना बुरे काम करने लगता हैं”
“पता नहीं माँ … मानव इतनी सारी धन-सम्पति प्राप्त करके करता क्या हैं हमारे यहाँ स्वर्ग लोक में कोई कुछ नहीं ला पाता फिर भी इतना लोभ क्यों हैं इस मानव प्राणी को? श्रीगणेश जी ने बड़े ही अचंभित स्वर में अपनी विवशता दर्शाते हुए माता से पूछा।
माता पार्वती के पास इसका कोई जवाब नहीं था इसलिए उसका ध्यान हटाने के लिए वह बोल पड़ी, "वह सब छोडो, पृथ्वीलोक जाने के पश्चात तुम अपना ध्यान रखना, कोरोना काल के कारण मानव तुमसे अनेक प्रकार की मांग करेंगे, कोरोना को भगाने के लिए तुम्हें अच्छे-अच्छे पकवान के भोग लगेंगे। तुम्हें खुश करने महाभोज का आयोजन करेंगे। काफ़ी मात्रा में लोगों की भीड़ इकट्ठा करेंगे जो इस महामारी के अनुरूप योग्य नहीं हैं। तुम उनके किसी भी प्रलोभन के झाँसे में मत आना। उन्हें अच्छी तरह से ज्ञान देकर कैसे इस महामारी से बचा जा सकता हैं और अपने परिवार, समाज को कैसे सुरक्षित रखा जा सकता हैं यह समझाना। जो बूरा काम करें उन्हें भी अपने सान्निध्य में रखकर बुराई का रास्ता छोडने के लिए प्रवृत्त करना।" माता पार्वती ने बाल गणेश को समझाते हुए कहा।
"पर माँ, अगर ऐसे संकट पृथ्वी पर नहीं आयेंगे तो मानवलोक से ईश्वर की आस्था नष्ट हो जाएगी। पृथ्वीलोक भारी विपत्ति में आ सकती हैं। मानवता और उनकी संवेदना दुर्लभ होकर समाप्त हो सकती हैं।"
"हाँ मेरे पुत्र! तुम सही कह रहे हो। परंतु मुझे स्वयं समझ नहीं आ रहा हैं कि तुम्हें मैं कैसे समझाऊ।" माता पार्वती ने अतिचिंतित स्थिति में आकर गणेश से कहा।
"पुत्र गणेश! एक बात जान लो बदलाव सृष्टि का नियम हैं और काल के अनुसार परिवर्तन करना यह हर मानव का परम कर्तव्य हैं। तुम्हें पृथ्वीलोक पर जाकर सभी को ज्ञान और बुद्धि का पाठ पढ़ाना होगा। संयमता के बारे में उन्हें अलग से प्रेरित करना होगा। संयम यह एक सफल जीवन का मूलमंत्र होने के साथ ही साथ महत्त्वपूर्ण लक्ष्य भी हैं। जो अपने आप पर तथा अपने कृति पर संयम पाता हैं उसे निश्चित रूप से अच्छा, सफल तथा सुखी जीवन प्राप्त होता हैं। सबर में वह शक्ति होती हैं जिससे तुम बड़े से बड़े आपातकालीन स्थिति को अपने अंकुश में कर सकते हो।" माता ने फिर एक बार श्री गणेश को अपने पास लेकर समझाने कि कोशिश की। 
"माँ... मुझे आप की बात अच्छी तरह से समझ में आ गयी हैं। परंतु मेरे बाबा जैसे मानवजाति को उसके इच्छानुसार वर, आशीर्वाद या फल नहीं दिया तो मेरा मान कम हो जाएगा।" गणेशजी ने निराशाजनक स्वर में कहा।
"हे लंबोदर! तुम ऐसा क्यों कहते हो? तुम्हारे बाबा तो भोलेनाथ हैं उनसे जो भी कुछ मांगता हैं वह तुरंत उन्हें दे देते हैं। परंतु तुम्हें इस बार थोड़ी सक्ति दिखानी होगी। लोगों को संयम और हर एक चीज की जान-माल की क़ीमत बतानी होगी। उन्हें थोड़ा इंतज़ार में रहकर मानवता को बढ़ाने कि सीख देनी होगी। छोटे-बड़े, स्त्री-पुरुष, बच्चे-बूढ़े सभी को मानव जीवन का महत्त्व और मानवजीव कि योनि में जन्म का कर्तव्य एवं अधिकार को समझाना होगा। उनका जीवन पृथ्वीलोक में मानवता को बढ़ाने के उद्देश्य से किया गया हैं इस बात को याद दिलाना होगा।" एक बार फिर माता पार्वती ने बाल गणेश को समझाते हुए कहा।
श्रीगणेश तो माता पार्वती की बातों में इस तरह विलिप्त हुए की उन्हें उनके वाहन मुषकराज ने आकर उनकी चेतना से जागृत किया और पूछा, "प्रभु! आप कहाँ खो गये माताजी तो आपसे बात करके चली गयी।"
अपने वाहन मुषक राज को देखकर गणेश जी खुश हुए और जोर-जोर हसने लगे। उनकी हँसी सुनकर माता पार्वती उनकी ओर आती हुई दिखायी दी जिनके हाथों में लड्डू का थाल था।
बाल गणेश ने कहा, "माँ इतने सारे लड्डू मेरे लिए... पर माँ मैं तो अभी पृथ्वीलोक पर जाउंगा तो मुझे वैसे भी भिन्न-भिन्न प्रकार के लड्डू और मोदक खाने मिलेंगे।"
बाल गणेश के गालों पर छोटी चिमटी काटते हुए माता ने कहा, "हाँ, ज़रूर मिलेंगे, पर माँ के हाथों का स्वाद कहाँ से पाओगे... चलो अब मुँह खोलो... आज मैं अपने हाथों से तुम्हें लड्डू खिलाउंगी। आ...आअ..."
"मुझे भी लड्डू ... मुझे भी लड्डू ... कहते-कहते मुषकराज भी नृत्य करने लगे।"
माता ने एक लड्डू मुषकराज के सामने करते हुए कहा, "हाँ... मुषक महाराज.... यह लीजिए आपके लिए भी हैं।"
तत्पश्चात माताजी ने श्री गणेश जी को विदा करते हुए कहा, "चलो... अब तुम अपनी सवारी पर विराजमान हो जाओ और पृथ्वीलोक कि ओर प्रस्थान करके मानवजाति को समृद्ध करो। अपना ध्यान रखना। वैसे भी मैं तो तीसरे दिन बाद गौरी का रूप लेकर तुम्हारे पास पहुच ही जाउंगी। तब तक तुम अपना ख़्याल रखना।"
 
✒️ सूर्यकांत सुतार ‘सूर्या’
        दार-ए-सलाम, तंज़ानिया, 



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